-भारत के लिए संकेत है कि आत्मनिर्भरता भावनात्मक नारा नहीं, रणनीतिक आवश्यकता है
-नए बदलाव से भारत को मिलेगा आंशिक लाभ

द न्‍यूज गली, ग्रेटर नोएडा: ट्रंप के नए ट्रैरिफ के बाद से पूरे विश्‍व में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। मामले में विशेषज्ञों के द्वारा अपने-अपने विचार व्‍यक्‍त किए जा रहे हैं। कुछ लोग इसे भारत के लिए व्‍यापार का नया द्वार खोलने का रास्‍ता बता रहे हैं तो कुछ नई परेशानियां। प्रमुख शिक्षाविद डॉ. शशांक अवस्थी का कहना है कि जब अमेरिका टैरिफ बढ़ाता है, तो वैश्विक मंच पर उसे संरक्षणवाद कहा जाता है। पर भारत की दृष्टि से यह केवल व्यापारिक निर्णय नहीं, बल्कि वही नैतिक दुविधा है जो महाभारत के कुरुक्षेत्र में अर्जुन के सामने थी:मैं करूँ क्या? गीता का उत्तर स्पष्ट था स्वधर्म। स्वधर्मे निधनं श्रेयः, परधर्मो भयावहः। ठीक उसी प्रकार से आज भारत के सामने भी यही प्रश्न है क्या वह सस्ते आयात के भरोसे अपनी अर्थव्यवस्था चलाए या अपने किसान, कारीगर और उद्योग की रक्षा करे?
ट्रंप का टैरिफ यह दिखाता है कि राष्ट्र अंततः अपने नागरिकों के हित में खड़े होते हैं। अमेरिका ने अपने श्रमिक और उद्योग को प्राथमिकता दी। भारत के लिए यह संकेत है कि आत्मनिर्भरता भावनात्मक नारा नहीं, रणनीतिक आवश्यकता है।

भारत को मिला अवसर
शशांक अवस्‍थी का कहना है कि 2018–20 के बीच अमेरिका ने $370 अरब से अधिक के चीनी आयात पर अतिरिक्त टैरिफ लगाए। परिणामस्वरूप वैश्विक आपूर्ति-श्रृंखला में बदलाव हुआ। कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने चीन के बाहर विकल्प तलाशे। भारत को भी अवसर मिला, बदलाव का भारत को आंशिक लाभ मिला।
अमेरिका को भारत का निर्यात $50 अरब (2018) से बढ़कर $83 अरब (2023–24) के आसपास पहुँचा।
विशेष रूप से फार्मा, मोबाइल व इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट
ऑटो-पार्ट्स, टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों में भारत की भागीदारी बढ़ी। यह स्पष्ट करता है कि टैरिफ केवल व्यापार की दीवार नहीं, बल्कि नई दिशा दिखाने वाला संकेतक भी हो सकता है।

भारत का आर्थिक कुरुक्षेत्र
भारत का कुरुक्षेत्र आज सीमा पर नहीं, बाज़ार में है।
देश का MSME क्षेत्र लगभग 11 करोड़ लोगों को रोज़गार देता है और GDP में करीब 30 प्रतिशत का योगदान करता है। लेकिन सस्ते आयात, खिलौने, इलेक्ट्रॉनिक्स और कपड़ा
घरेलू उद्योग पर दबाव बनाते हैं। यहीं गीता का आर्थिक संदेश प्रासंगिक हो जाता है “कर्मण्येवाधिकारस्ते…भारत का अधिकार अपने कर्म पर है अपने उत्पादन, अपनी तकनीक और अपनी वैल्यू चेन पर। आत्मनिर्भर भारत: नारा से नीति तक बीते वर्षों में भारत ने ठोस नीतिगत कदम उठाए जिसमें प्रमुख रूप से PLI योजना रही, जिसमें 14 प्रमुख सेक्टर, लगभग ₹2 लाख करोड़ का प्रोत्साहन हुआ।  इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण:मोबाइल फोन निर्यात 2014 में लगभग शून्य से बढ़कर 2024 में ₹1.2 लाख करोड़ से अधिक रहा। रक्षा उत्पादन: आयात निर्भरता लगभग 65 प्रतिशत से घटकर 45 पर आ गया, यह वही संतुलित नीति है जिसे गीता राजयोग कहती है “योगः कर्मसु कौशलम्, अर्थात अर्थनीति में कुशल संतुलन ही सच्चा योग है। गीता की चेतावनी

गीता केवल आत्मरक्षा नहीं, विवेक भी सिखाती है
“अहंकार विमूढात्मा…टैरिफ तब धर्म है जब वह दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धा बढ़ाए और घरेलू सुधारों के साथ लागू हो। लेकिन यदि उससे नवाचार रुके या उपभोक्ता पर महँगाई का बोझ बढ़े, तो वही नीति अधर्म बन जाती है।

अंत में निष्कर्ष के रूप में सामने आता है कि
ट्रंप का टैरिफ भारत के लिए न तो सीधा मॉडल है,
न ही तत्काल खतरा। वह एक दर्पण है जो बताता है कि वैश्विक व्यवस्था में वही राष्ट्र टिकता है जो अपने स्वधर्म को पहचानता है। भारत के पास वह मार्गदर्शक पहले से मौजूद है। अब प्रश्न यह नहीं कि दुनिया क्या कर रही है,
बल्कि प्रश्न यह है कि क्या भारत अपनी अर्थनीति का कृष्ण स्वयं बनेगा?