द न्‍यूज गली, ग्रेटर नोएडा: लॉयड इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी के डिपार्टमेंट ऑफ़ फार्मेसी में हेल्थ टेक्नोलॉजी ट्रांसलेशन, रेगुलेशन एवं इनोवेशन विषय पर पाँच दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन हुआ। स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (डीएचआर)-भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा प्रायोजित इस कार्यशाला की थीम “क्लिनिकल ज़रूरत से मेडिकल प्रोडक्ट विकास तक एक एकीकृत मार्ग” थी। कार्यशाला के आयोजन सचिव की भूमिका में डॉ. ललित कुमार त्यागी, प्राचार्य, एलआईएमटी (डिपार्टमेंट ऑफ फार्मेसी) एवं प्रो. (डॉ.) आरती गुप्ता रहे। देशभर से प्राप्त 177 पंजीकरणों में से कठोर चयन प्रक्रिया के बाद केवल 78 प्रतिभागियों का चयन किया गया। जो इस कार्यशाला के प्रति युवा शोधार्थियों के व्यापक उत्साह को दर्शाता है। सात से अधिक राज्यों और 25 से अधिक महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों से आए प्रतिभागियों ने इस आयोजन को सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय मंच का स्वरूप प्रदान किया। जीआईआईएमएस के सेंटर फॉर मेडिकल इनोवेशन के सीईओ डॉ. राहुल सिंह ने मेडटेक, डिजिटल हेल्थ और क्लिनिकल ट्रायल्स में करियर की संभावनाओं पर बात की। टैसिट मेडटेक के संस्थापक श्री विवेक कुमार सिंह ने स्टार्टअप्स के लिए मेडिकल डिवाइस रेगुलेटरी रणनीति समझाई। नाइपर रायबरेली के शआशीष दिलीप सुतार ने क्यूबीडी आधारित डिज़ाइन ऑफ एक्सपेरिमेंट्स का प्रशिक्षण दिया।

प्रतियोगिता का आयोजन
प्रतिभागियों के बीच क्विज़ प्रतियोगिता आयोजित की गई, जिसके विजेताओं को प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए। समापन सत्र को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (डीएचआर) के मानव संसाधन विकास प्रभाग की साइंटिस्ट-सी एवं प्रोग्राम ऑफिसर डॉ. गीतांजलि सजीना ने संबोधित किया। उन्होंने कहा कि डीएचआर-आईसीएमआर देशभर के शिक्षण एवं शोध संस्थानों को शोध अनुदान, मानव संसाधन प्रशिक्षण और आवश्यक सुविधाओं के माध्यम से निरंतर सहयोग प्रदान करते हैं। इस तरह की कार्यशालाएँ युवा शोधकर्ताओं को विचार से उत्पाद तक की यात्रा के लिए तैयार करती हैं। मैं संस्थानों और प्रतिभागियों से आग्रह करती हूँ कि वे उपलब्ध अवसरों का लाभ उठाकर स्वदेशी, किफ़ायती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य तकनीक विकसित करें।लॉयड ग्रुप डायरेक्टर एवं चीफ स्ट्रैटेजिस्ट प्रो. (डॉ.) वंदना अरोड़ा सेठी ने कहा कि आज की आवश्यकता है कि शोध प्रयोगशाला से निकलकर मरीज़ों तक पहुँचे, और इसमें इस तरह की कार्यशालाओं से मिलने वाला हैं ड्स-ऑन अनुभव बहुत महत्वपूर्ण है। यह कार्यशाला विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं को क्लिनिकल ज़रूरत की पहचान से लेकर नियामक प्रक्रिया और उत्पाद विकास तक की स्पष्ट राह दिखाती है।